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mahabharat 5.161.34: इस प्रकार क्षत्रिय सदैव अपने प्रतिद्वन्द्वियों को दण्ड देते आये हैं। इसीलिए तुम्हें भी सिर पर जटा रखकर, नपुंसक का वेश धारण करके राजा विराट की पुत्री को नचाना पड़ा।' 34.   |   mahabharat अध्याय 5.161: पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उलूकका भरी सभामें दुर्योधनका संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 161: पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उलूकका भरी सभामें दुर्योधनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.161.34 
एवमेतत् सदा दण्डं क्षत्रिया: क्षत्रिये दधु:।
वेणीं कृत्वा षण्ढवेष: कन्यां नर्तितवानसि॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार क्षत्रिय सदैव अपने प्रतिद्वन्द्वियों को दण्ड देते आये हैं। इसीलिए तुम्हें भी सिर पर जटा रखकर, नपुंसक का वेश धारण करके राजा विराट की पुत्री को नचाना पड़ा।' 34.
 
‘In this way, Kshatriyas have always punished their rivals. That is why you too had to wear a braid on your head and wear the disguise of a eunuch and make King Virat's daughter dance. 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)