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mahabharat 5.161.12-13h: युद्धभूमि में भीष्म का सामना करने से पहले ही तुम अपनी झूठी प्रशंसा क्यों करते हो? कुन्तीपुत्र! जैसे दुर्बल और मंदबुद्धि मनुष्य गंधमादन पर्वत पर चढ़ने की इच्छा करता है, वैसे ही तुम भी अपनी बड़ी-बड़ी बातें करते रहते हो। कहानियाँ मत बनाओ; पुरुष बनो (अपना पुरुषत्व दिखाओ)॥12 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 5.161: पाण्डवोंके शिविरमें पहुँचकर उलूकका भरी सभामें दुर्योधनका संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.161.12-13h 
असमागम्य भीष्मेण संयुगे किं विकत्थसे।
आरुरुक्षुर्यथा मन्द: पर्वतं गन्धमादनम्॥ १२॥
एवं कत्थसि कौन्तेय अकत्थन् पुरुषो भव।
 
 
अनुवाद
युद्धभूमि में भीष्म का सामना करने से पहले ही तुम अपनी झूठी प्रशंसा क्यों करते हो? कुन्तीपुत्र! जैसे दुर्बल और मंदबुद्धि मनुष्य गंधमादन पर्वत पर चढ़ने की इच्छा करता है, वैसे ही तुम भी अपनी बड़ी-बड़ी बातें करते रहते हो। कहानियाँ मत बनाओ; पुरुष बनो (अपना पुरुषत्व दिखाओ)॥12 1/2॥
 
‘Why do you falsely praise yourself even before facing Bhishma in the battlefield? Son of Kunti! Just like a weak and dull-witted man wishes to climb the Gandhamadan mountain, you also keep talking big about yourself. Don't make up stories; be a man (show your manliness)॥ 12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)