श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 160: दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना  »  श्लोक 94-95h
 
 
श्लोक  5.160.94-95h 
असमागम्य भीष्मेण संयुगे किं विकत्थसे।
आरुरुक्षुर्यथा मन्द: पर्वतं गन्धमादनम्॥ ९४॥
एवं कत्थसि कौन्तेय अकत्थन् पुरुषो भव।
 
 
अनुवाद
भीष्म से युद्ध करने से पहले ही तुम अपनी झूठी प्रशंसा क्यों करते हो? कुन्तीपुत्र! जैसे दुर्बल और मंदबुद्धि मनुष्य गंधमादन पर्वत पर चढ़ना चाहता है, वैसे ही तुम भी अपनी झूठी प्रशंसा कर रहे हो। अपनी झूठी प्रशंसा करने के स्थान पर मनुष्य बनो।॥94 1/2॥
 
‘Why do you falsely praise yourself even before you have fought Bhishma in battle? Son of Kunti! Just as a weak and dull-witted man wants to climb the Gandhamadan mountain, you too are falsely praising yourself. Instead of falsely praising yourself, become a man.'॥ 94 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)