श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 160: दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना  »  श्लोक 61-62h
 
 
श्लोक  5.160.61-62h 
युध्यस्वाद्य रणे यत्त: पश्याम: पुरुषो भव।
यस्तु शत्रुमभिज्ञाय शुद्धं पौरुषमास्थित:॥ ६१॥
करोति द्विषतां शोकं स जीवति सुजीवितम्।
 
 
अनुवाद
अब युद्ध में डटे रहो। हम तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपना पुरुषत्व दिखाओ। जो पुरुष शत्रु को भली-भाँति समझता है, शुद्ध पुरुषत्व का आश्रय लेकर शत्रु को कष्ट देता है, वही उत्तम जीवन जीता है।'
 
‘Now stand firm in the battle. We are waiting for you. Show your masculinity. The man who understands the enemy well and takes recourse to pure masculinity and makes the enemy suffer, he leads the best life. 61 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)