मनसैव हि भूतानि धातैव कुरुते वशे।
यद् ब्रवीषि च वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रानहं रणे॥ ५८॥
घातयित्वा प्रदास्यामि पार्थेभ्यो राज्यमुत्तमम्।
आचचक्षे च मे सर्वं संजयस्तव भाषितम्॥ ५९॥
अनुवाद
एकमात्र विधाता अपने मनमात्र के संकल्प से ही समस्त प्राणियों को नियंत्रित करते हैं। वार्ष्णेय! आप कहते थे कि मैं युद्ध में धृतराष्ट्र के समस्त पुत्रों को मार डालूँगा और उनका सम्पूर्ण राज्य कुन्तीपुत्रों को दे दूँगा। संजय ने आपकी सारी बातें मुझे सुनाई थीं।' 58-59
‘The only Creator controls all creatures by his mere mental resolve. Varshneya! You used to say that I will kill all the sons of Dhritarashtra in the war and give his entire kingdom to the sons of Kunti. Sanjaya had narrated all your speeches to me. 58-59.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥