श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 160: दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  5.160.28-29 
युष्माभिरपि कर्तव्यं वचनं मम नित्यश:।
तपसास्मि परिश्रान्तो दृढं नियममास्थित:॥ २८॥
न चापि गमने शक्तिं काञ्चित् पश्यामि चिन्तयन्।
सोऽस्मि नेय: सदा तात नदीकूलमित: परम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें भी प्रतिदिन मेरी एक आज्ञा का पालन करना होगा । मैं तपस्या करते-करते बहुत थक गया हूँ और नियम-अनुशासन का दृढ़तापूर्वक पालन करने में लगा हुआ हूँ । बहुत सोचने पर भी मुझमें चलने की शक्ति नहीं आती; इसलिए हे पिताश्री, तुम्हें मुझे यहाँ से सदैव नदी के तट तक ले जाना होगा ।॥ 28-29॥
 
‘You too will have to obey one of my commands every day. I am very tired of performing tapasya and I am firmly engaged in following the rules and discipline. Even after thinking a lot, I do not find any strength in me to walk; therefore, dear father, you will always have to take me from here to the river bank.॥ 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)