श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 160: दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  5.160.125 
तदा मनस्ते त्रिदिवादिवाशुचे-
र्निवर्तिता पार्थ महीप्रशासनात्।
प्रशाम्य राज्यं हि सुदुर्लभं त्वया
बुभूषित: स्वर्ग इवातपस्विना॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! जैसे पतित मनुष्य का मन स्वर्ग से विमुख हो जाता है (क्योंकि उसके लिए स्वर्ग प्राप्ति असम्भव है), वैसे ही तुम्हारा मन भी निराश होकर इस पृथ्वी पर शासन करने से विमुख हो जाएगा। अर्जुन! चुपचाप बैठ जाओ। राजपद तुम्हारे लिए अत्यंत दुर्लभ है। जैसे तप न करने वाला स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करता है, वैसे ही तुमने भी राज्य की कामना की है॥ 125॥
 
Partha! Just as the mind of an impure man turns away from heaven (because attainment of heaven is impossible for him), similarly your mind will also turn away from ruling this earth in despair. Arjuna! Sit down quietly. Kingship is very rare for you. Just as one who has not done penance wishes to attain heaven, similarly you have also desired the kingdom.॥ 125॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि उलूकदूतागमनपर्वणि दुर्योधनवाक्ये षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूतागमनपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)