श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 160: दुर्योधनका उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजना और उनसे कहनेके लिये संदेश देना  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  5.160.116 
एवमेव सदा दण्डं क्षत्रिया: क्षत्रिये दधु:।
वेणीं कृत्वा षण्ढवेष: कन्यां नर्तितवानसि॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय सदैव अपने प्रतिद्वन्द्वियों को इसी प्रकार दण्ड देते आए हैं। इसीलिए तुम्हें भी सिर पर चोटी बांधनी पड़ी, हिजड़े का वेश धारण करना पड़ा और राजा के हरम में कन्याओं को नचाना पड़ा।
 
‘Kshatriyas have always punished their rivals in this manner. That is why you too had to wear a braid on your head and dress up as a eunuch and make the girls dance in the king's harem.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)