श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 16: बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.16.4 
त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हवि:।
यजन्ति सत्रैस्त्वामेव यज्ञैश्च परमाध्वरे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अग्नि! आप हवि धारण करने वाले देवता हैं। आप ही सर्वश्रेष्ठ हवि हैं। यज्ञ करने वाले विद्वान पुरुष बड़े-बड़े यज्ञों में बारी-बारी से यज्ञों और यज्ञों के द्वारा आपकी पूजा करते हैं। ॥4॥
 
Agni! You are the god who carries the offerings. You are the best offering. The learned men who perform the sacrifices worship you in the big sacrifices through the alternate sessions and sacrifices. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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