श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 16: बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.16.26 
तेजोहरं दृष्टिविषं सुघोरं
मा त्वं पश्येर्नहुषं वै कदाचित्।
देवाश्च सर्वे नहुषं भृशार्ता
न पश्यन्ते गूढरूपाश्चरन्त:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
वह देखने मात्र से ही सबका तेज हर लेता है । उसकी दृष्टि में भयंकर विष है । वह अत्यंत भयंकर स्वभाव का हो गया है । तुम्हें नहुष की ओर कभी नहीं देखना चाहिए । समस्त देवता भी अत्यंत व्याकुल होकर रहस्यमय ढंग से विचरण करते रहते हैं; परंतु वे नहुष की ओर कभी नहीं देखते ॥ 26॥
 
He takes away the glory of everyone just by looking at him. There is a terrible poison in his sight. He has become extremely fierce in nature. You should never look at Nahush. All the gods too are extremely distressed and keep wandering in a mysterious manner; but they never look at Nahush.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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