श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 16: बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  5.16.23-24 
बृहस्पतिरुवाच
देवा भीता: शक्रमकामयन्त
त्वया त्यक्तं महदैन्द्रं पदं तत्।
तदा देवा: पितरोऽथर्षयश्च
गन्धर्वमुख्याश्च समेत्य सर्वे॥ २३॥
गत्वाब्रुवन् नहुषं तत्र शक्र
त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता।
तानब्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त
आप्यायध्वं तपसा तेजसा माम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पतिजी बोले- शंकर! जब आपने इन्द्र के उस महान पद का परित्याग कर दिया, तब देवतागण भयभीत हो गए और किसी अन्य इन्द्र की कामना करने लगे। तब देवता, पितर, ऋषिगण और प्रमुख गन्धर्व- सभी मिलकर राजा नहुष के पास गए। शंकर! वहाँ उन्होंने नहुष से इस प्रकार कहा- 'आप हमारे राजा बनकर सम्पूर्ण जगत की रक्षा कीजिए।' यह सुनकर नहुष ने उनसे कहा- 'मुझमें इन्द्र बनने की शक्ति नहीं है, अतः आप सभी अपने तप और तेज से मुझे संतुष्ट कीजिए।'॥ 23-24॥
 
Brihaspati said- Shankar! When you abandoned that great position of Indra, then the gods became afraid and started wishing for some other Indra. Then the gods, ancestors, sages and chief Gandharvas- all together went to king Nahush. Shankar! There they told Nahush in this way- 'You become our king and protect the whole world.' On hearing this Nahush said to them- 'I do not have the power to become Indra, so you all please satisfy me with your penance and brilliance.'॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)