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श्लोक 5.16.15  |
शतक्रतो विवर्धस्व सर्वाञ्छत्रून् निषूदय।
उत्तिष्ठ शक्र सम्पश्य देवर्षींश्च समागतान्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| शतक्रतो! आप अपने तेजस्वी रूप से आगे बढ़कर समस्त शत्रुओं का नाश कीजिए। इन्द्रदेव! उठकर यहाँ आये हुए ऋषियों को देखिए।॥15॥ |
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| ‘Shatakrato! You advance with your radiant form and destroy all the enemies. Lord Indra! Get up and see the sages who have arrived here.॥ 15॥ |
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