श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 16: बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.16.10 
शल्य उवाच
प्रविश्यापस्ततो वह्नि: ससमुद्रा: सपल्वला:।
आससाद सरस्तच्च गूढो यत्र शतक्रतु:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
शल्य बोले: युधिष्ठिर! तत्पश्चात् अग्निदेव छोटे-छोटे गड्ढों और बड़े-बड़े समुद्र के जल में प्रवेश करते हुए धीरे-धीरे उस सरोवर तक पहुँच गए जहाँ इन्द्र छिपे हुए थे॥10॥
 
Shalya said: Yudhishthira! Thereafter the god of fire entered the waters of every small pit and the biggest ocean and gradually reached the lake where Indra was hiding.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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