श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 16: बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.16.1 
बृहस्पतिरुवाच
त्वमग्ने सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट्।
त्वमन्त: सर्वभूतानां गूढश्चरसि साक्षिवत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पति बोले- अग्निदेव! आप समस्त देवताओं के मुख हैं। आप ही देवताओं को हवि प्रदान करने वाले हैं। आप समस्त प्राणियों के हृदय में साक्षी भाव से रहस्यमय ढंग से विचरण करते हैं॥1॥
 
Brihaspati said— Agnidev! You are the mouth of all the gods. You are the one who delivers offerings to the gods. You move in the hearts of all living beings in a mysterious manner like a witness.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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