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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 159: धृतराष्ट्र और संजयका संवाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.159.6 
भवत्येव हि मे सूत बुद्धिर्दोषानुदर्शिनी।
दुर्योधनं समासाद्य पुन: सा परिवर्तते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सुत! मेरा मन बार-बार उपर्युक्त दोषों को देखता और समझता है, किन्तु दुर्योधन से मिलकर वह पुनः बदल जाता है।
 
Sut! My mind repeatedly sees and understands the above-mentioned faults, but on meeting Duryodhan it changes again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)