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mahabharat 5.157.30: परन्तु युधिष्ठिर! मधुसूदन श्रीकृष्ण ने तुम्हारे ही कारण मेरी बात नहीं मानी है। अर्जुन को देखकर वे उसके लिए सब प्रकार से अपने को न्योछावर कर रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 5.157: युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 157: युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.157.30 
तच्च मे नाकरोद् वाक्यं त्वदर्थे मधुसूदन:।
निर्विष्ट: सर्वभावेन धनंजयमवेक्ष्य ह॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
परन्तु युधिष्ठिर! मधुसूदन श्रीकृष्ण ने तुम्हारे ही कारण मेरी बात नहीं मानी है। अर्जुन को देखकर वे उसके लिए सब प्रकार से अपने को न्योछावर कर रहे हैं।
 
But Yudhishthira! It is for your sake that Madhusudan Sri Krishna has not accepted my words. Seeing Arjuna, he is sacrificing himself for him in every way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)