श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 157: युधिष्ठिरके द्वारा अपने सेनापतियोंका अभिषेक, यदुवंशियोंसहित बलरामजीका आगमन तथा पाण्डवोंसे विदा लेकर उनका तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.157.25 
भवितायं महारौद्रो दारुण: पुरुषक्षय:।
दिष्टमेतद् ध्रुवं मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा प्रतीत होता है कि यह भीषण एवं भयंकर नरसंहार अवश्य होगा। मैं नियति के इस निर्णय को अवश्यम्भावी मानता हूँ। अब इसे बदला नहीं जा सकता॥ 25॥
 
‘It seems that this horrific and dreadful massacre will surely take place. I consider this decree of destiny to be inevitable. Now it cannot be changed.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)