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श्लोक  5.155.14-15 
धुर्ययोर्हययोरेकस्तथान्यौ पार्ष्णिसारथी।
तौ चापि रथिनां श्रेष्ठौ रथी च हयवित् तथा॥ १४॥
नगराणीव गुप्तानि दुराधर्षाणि शत्रुभि:।
आसन् रथसहस्राणि हेममालीनि सर्वश:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक रथ के दो घोड़ों के लिए एक रक्षक होता था, और प्रत्येक रथ के लिए दो चक्ररक्षक नियुक्त होते थे। वे दोनों ही रथियों में श्रेष्ठ थे और घुड़सवारी की कला में भी निपुण थे। स्वर्ण मालाओं से सुसज्जित हजारों रथ चारों ओर से शोभायमान थे। शत्रुओं के लिए उन्हें भेदना अत्यंत कठिन था। वे सभी नगरों के समान सुरक्षित थे।
 
Each chariot had one guard for each of its two horses, and two chakravarakshaks were appointed for each chariot. Both of them were the best among charioteers and were also proficient in the art of horsemanship. Thousands of chariots adorned with golden garlands looked beautiful on all sides. It was very difficult for the enemies to penetrate them. All of them were as secure as cities.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)