श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भगवान‍् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान‍्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा इस विषयमें युधिष्ठिरका संताप और अर्जुनद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका समर्थन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.154.20 
यदर्थं वनवासश्च प्राप्तं दु:खं च यन्मया।
सोऽयमस्मानुपैत्येव परोऽनर्थ: प्रयत्नत:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जिससे बचने के लिए मैंने वनवास का कष्ट सहा और अनेक प्रकार के दुःख सहे, वह महान विपत्ति मेरे प्रयत्न से भी नहीं टल सकी। वह हम पर आ पड़ना चाहती है॥ 20॥
 
To escape from which I accepted the pain of exile and endured many kinds of sorrows, that great calamity could not be averted even by my efforts. It wants to befall us.॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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