|
| |
| |
श्लोक 5.154.20  |
यदर्थं वनवासश्च प्राप्तं दु:खं च यन्मया।
सोऽयमस्मानुपैत्येव परोऽनर्थ: प्रयत्नत:॥ २०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| जिससे बचने के लिए मैंने वनवास का कष्ट सहा और अनेक प्रकार के दुःख सहे, वह महान विपत्ति मेरे प्रयत्न से भी नहीं टल सकी। वह हम पर आ पड़ना चाहती है॥ 20॥ |
| |
| To escape from which I accepted the pain of exile and endured many kinds of sorrows, that great calamity could not be averted even by my efforts. It wants to befall us.॥ 20॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|