श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 153: दुर्योधनका सेनाको सुसज्जित होने और शिविर-निर्माण करनेके लिये आज्ञा देना तथा सैनिकोंकी रणयात्राके लिये तैयारी  »  श्लोक 25-27
 
 
श्लोक  5.153.25-27 
जनौघसलिलावर्तो रथनागाश्वमीनवान्।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोष: कोशसंचयरत्नवान्॥ २५॥
चित्राभरणवर्मोर्मि: शस्त्रनिर्मलफेनवान्।
प्रासादमालाद्रिवृतो रथ्यापणमहाह्रद:॥ २६॥
योधचन्द्रोदयोद्‍भूत: कुरुराजमहार्णव:।
व्यदृश्यत तदा राजंश्चन्द्रोदय इवोदधि:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
राजन! जैसे चंद्रोदय के समय समुद्र में उत्पात मच जाता है, उसी प्रकार कुरुराज दुर्योधन का समुद्र सेना रूपी चंद्रमा के उदय होने पर अत्यंत प्रसन्न दिखाई दे रहा था। वहाँ विचरण करती हुई भीड़ जल में उठते हुए भँवरों के समान प्रतीत हो रही थी। रथ, हाथी और घोड़े उसमें मछलियों के समान दिखाई दे रहे थे। शंख और नगाड़ों की ध्वनि कुरुराज के समुद्र की गर्जना थी। निधियों का संग्रह रत्नों की प्रचुरता का द्योतक था। योद्धाओं के विचित्र आभूषण और कवच उस समुद्र की उठती हुई लहरों के समान प्रतीत हो रहे थे। चमकते हुए हथियार शुद्ध झाग के समान प्रतीत हो रहे थे। महलों की पंक्तियाँ तट पर पर्वतों के समान प्रतीत हो रही थीं। मार्गों पर स्थित दुकानें गुफाओं के समान प्रतीत हो रही थीं।
 
King! Just as the sea is filled with turbulent waves at the time of moonrise, similarly the ocean of Kuru King Duryodhana appeared very happy with the rise of the moon in the form of the army. The crowd roaming around there appeared like the whirlpools rising in the water. Chariots, elephants and horses appeared like fish in it. The sound of conches and drums was the roar of the sea of ​​Kuru King. The collection of treasures was representing the abundance of gems. The strange ornaments and armour of the warriors appeared like the rising waves of that sea. The shining weapons appeared like pure foam. The rows of palaces appeared like mountains on the shore. The shops situated on the roads were like caves.
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि दुर्योधनसैन्यसज्जकरणे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें ‘दुर्योधनका अपनी सेनाको सुसज्जित करना’ इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५३॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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