श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 151: पाण्डवपक्षके सेनापतिका चुनाव तथा पाण्डव-सेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश  »  श्लोक 45-47
 
 
श्लोक  5.151.45-47 
युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि मे मता:।
न धार्तराष्ट्रा: शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्ट्वा धनंजयम्॥ ४५॥
भीमसेनं च संक्रुद्धं यमौ चापि यमोपमौ।
युयुधानद्वितीयं च धृष्टद्युम्नममर्षणम्॥ ४६॥
अभिमन्युं द्रौपदेयान् विराटद्रुपदावपि।
अक्षौहिणीपतींश्चान्यान् नरेन्द्रान् भीमविक्रमान्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
‘अतः तुम अपनी सेना को युद्ध के लिए अच्छी तरह सुसज्जित करो; क्योंकि मेरी राय में शत्रुओं को मारकर ही उन्हें वश में किया जा सकता है। वीर अर्जुन, क्रोधी भीमसेन, यमराज के समान नकुल-सहदेव, सात्यकि सहित निर्भय धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, विराट, द्रुपद तथा अक्षौहिणी सेनाओं के सेनापति तथा अन्य भयंकर पराक्रमी राजाओं को युद्ध के लिए तैयार देखकर धृतराष्ट्र के पुत्र रणभूमि में टिक न सकेंगे।।45-47॥
 
‘Therefore, equip your army well for war; Because in my opinion they can be subdued only by killing the enemy. Seeing the brave Arjun, the angry Bhimsen, Nakula-Sahadeva like Yamraj, the fearless Dhrishtadyumna along with Satyaki, Abhimanyu, the five sons of Draupadi, Virata, Drupada and the commander of the Akshauhini armies and other fiercely mighty kings ready for war, the sons of Dhritarashtra would not be able to survive in the battlefield. 45-47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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