श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 149: दुर्योधनके प्रति धृतराष्ट्रके युक्तिसंगत वचन—पाण्डवोंको आधा राज्य देनेके लिये आदेश  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  5.149.17-18 
देवापिस्तु महातेजास्त्वग्दोषी राजसत्तम:।
धार्मिक: सत्यवादी च पितु: शुश्रूषणे रत:॥ १७॥
पौरजानपदानां च सम्मत: साधुसत्कृत:।
सर्वेषां बालवृद्धानां देवापिर्हृदयंगम:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
नृपश्रेष्ठ देवापि अत्यन्त तेजस्वी होते हुए भी चर्मरोग से पीड़ित थे। वे धार्मिक, सत्यवादी, पिता की सेवा में तत्पर, ऋषियों द्वारा पूजनीय तथा नगर एवं जनपदवासियों द्वारा आदरणीय थे। देवापाणि ने बालकों से लेकर वृद्धों तक सबके हृदय में अपना स्थान बना लिया था। 17-18॥
 
‘Nripashreshtha Devapi, despite being very brilliant, was suffering from skin disease. He was religious, truthful, ready to serve his father, respected by sages and respected by the residents of the city and district. Devapani had made her place in the hearts of everyone from children to old people. 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)