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mahabharat 5.146.24: कर्ण के ये वचन सुनकर कुन्ती ने अपने धैर्य से अविचलित पुत्र कर्ण को हृदय से लगा लिया और दुःख से काँपती हुई बोली-॥24॥   |   mahabharat अध्याय 5.146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.146.24 
इति कर्णवच: श्रुत्वा कुन्ती दु:खात् प्रवेपती।
उवाच पुत्रमाश्लिष्य कर्णं धैर्यादकम्पनम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
कर्ण के ये वचन सुनकर कुन्ती ने अपने धैर्य से अविचलित पुत्र कर्ण को हृदय से लगा लिया और दुःख से काँपती हुई बोली-॥24॥
 
On hearing these words of Karna, Kunti embraced her son Karna, who was unperturbed by her patience, and said trembling with grief -॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)