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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  5.146.16-17 
कृतार्था: सुभृता ये हि कृत्यकाले ह्युपस्थिते।
अनवेक्ष्य कृतं पापा विकुर्वन्त्यनवस्थिता:॥ १६॥
राजकिल्बिषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम्।
नैवायं न परो लोको विद्यते पापकर्मणाम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो लोग किसी के द्वारा अच्छी तरह पोषित और तृप्त किये जाते हैं, किन्तु जब उस उपकार का बदला चुकाने का समय आता है, तो वे चंचल मन वाले पापी मनुष्य पूर्व में किये गए उपकार को न देखकर बदल जाते हैं, वे अपने स्वामी का अन्न चुराने वाले और दयालु राजा के अपराधी होते हैं। उन कृतघ्न पापियों के लिए न तो यह लोक सुखदायक है और न ही परलोक।
 
Those who are well nourished and nurtured by someone and are gratified; but when the time comes to repay that kindness, those sinful men with unstable minds change without seeing the kindness done in the past, they are those who steal food from their master and are criminals against the benevolent king. Neither this world nor the next world is pleasant for those ungrateful sinners.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)