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mahabharat 5.146.12-13: जो शत्रुओं से वैर करके नित्य मेरी पूजा करते हैं, जैसे वसु इन्द्र के सामने सिर झुकाते हैं, जो मेरे प्राण-बल पर भरोसा करके शत्रुओं के सामने डटकर खड़े रहने का साहस रखते हैं, तथा जो इसी आशा से मेरा आदर करते हैं, उनके मनोरथों को मैं कैसे नष्ट कर सकता हूँ? ॥12-13॥   |   mahabharat अध्याय 5.146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  5.146.12-13 
उपनह्य परैर्वैरं ये मां नित्यमुपासते।
नमस्कुर्वन्ति च सदा वसवो वासवं यथा॥ १२॥
मम प्राणेन ये शत्रूञ्शक्ता: प्रतिसमासितुम्।
मन्यन्ते ते कथं तेषामहं छिन्द्यां मनोरथम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जो शत्रुओं से वैर करके नित्य मेरी पूजा करते हैं, जैसे वसु इन्द्र के सामने सिर झुकाते हैं, जो मेरे प्राण-बल पर भरोसा करके शत्रुओं के सामने डटकर खड़े रहने का साहस रखते हैं, तथा जो इसी आशा से मेरा आदर करते हैं, उनके मनोरथों को मैं कैसे नष्ट कर सकता हूँ? ॥12-13॥
 
How can I destroy the desires of those who worship me regularly by making enmity with their enemies and those who always bow their heads in front of me just as the Vasus bow their heads in front of Indra, those who have the courage to stand firmly against their enemies relying on my life-force and those who respect me with this hope? ॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)