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mahabharat 5.146.1: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात सूर्यमण्डल से एक वाणी प्रकट हुई, जो स्वयं सूर्यदेव द्वारा कही गई थी। यह पितृ-स्नेह से परिपूर्ण तथा दुर्लभ प्रतीत हो रही थी। कर्ण ने उसे सुना।   |   mahabharat अध्याय 5.146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 146: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.146.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: सूर्यान्निश्चरितां कर्ण: शुश्राव भारतीम्।
दुरत्ययां प्रणयिनीं पितृवद् भास्करेरिताम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात सूर्यमण्डल से एक वाणी प्रकट हुई, जो स्वयं सूर्यदेव द्वारा कही गई थी। यह पितृ-स्नेह से परिपूर्ण तथा दुर्लभ प्रतीत हो रही थी। कर्ण ने उसे सुना।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Thereafter a voice appeared from the solar system, which was spoken by the Sun God himself. It was full of fatherly affection and seemed rare. Karna heard it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)