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श्लोक 5.145.12  |
उपपन्नो गुणै: सर्वैर्ज्येष्ठ: श्रेष्ठेषु बन्धुषु।
सूतपुत्रेति मा शब्द: पार्थस्त्वमसि वीर्यवान्॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| आप अपने श्रेष्ठ स्वभाव वाले भाइयों में सर्वगुण संपन्न ज्येष्ठ भाई, परम पराक्रमी कुन्तीपुत्र कर्ण हैं। आपके लिए 'सूतपुत्र' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। 12॥ |
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| Among your brothers of noble nature, you are the eldest brother full of all qualities, the most valiant son of Kunti, Karna. The word Sutaputra should not be used for you. 12॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कुन्ती और कर्णकी भेंटके प्रसंगमें एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४५॥
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