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mahabharat 5.144.30: जब कर्ण, जो नियमित रूप से व्रत और मंत्र जप करता रहता था, सूर्य के उसकी पीठ पर गर्मी देने तक पीछे मुड़ा (जब तक सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर नहीं चला गया), तो उसने कुंती को अपने सामने पाया, हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया और उसके पास खड़ा हो गया।   |   mahabharat अध्याय 5.144: विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 144: विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.144.30 
आपृष्ठतापाज्जप्त्वा स परिवृत्य यतव्रत:।
दृष्ट्वा कुन्तीमुपातिष्ठदभिवाद्य कृताञ्जलि:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जब कर्ण, जो नियमित रूप से व्रत और मंत्र जप करता रहता था, सूर्य के उसकी पीठ पर गर्मी देने तक पीछे मुड़ा (जब तक सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर नहीं चला गया), तो उसने कुंती को अपने सामने पाया, हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया और उसके पास खड़ा हो गया।
 
When Karna, who had been observing fasts regularly and chanting mantras, turned back until the Sun started giving heat on his back (until the Sun moved from east to west), he found Kunti in front of him, folded his hands and bowed down to her and stood beside her.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)