Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.144.19-21: जब मैं अपने पिता के घर में रहती थी, तब मैंने भगवान दुर्वासा को अपनी सेवाओं से प्रसन्न किया और उन्होंने मुझे वरदान दिया कि मैं किसी भी देवता को मंत्रों द्वारा बुला सकती हूँ। मेरे पिता कुन्तीभोज मेरा बहुत सम्मान करते थे। राजा के अन्तःपुर में रहते हुए मैं भारी मन से ब्राह्मण की मन्त्रशक्ति और वाणीशक्ति का चिन्तन करने लगी।॥19-21॥ | mahabharat अध्याय 5.144: विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तोषितो भगवान् यत्र दुर्वासा मे वरं ददौ॥ १९॥
आह्वानं मन्त्रसंयुक्तं वसन्त्या: पितृवेश्मनि।
साहमन्त:पुरे राज्ञ: कुन्तिभोजपुरस्कृता॥ २०॥
चिन्तयन्ती बहुविधं हृदयेन विदूयता।
बलाबलं च मन्त्राणां ब्राह्मणस्य च वाग्बलम्॥ २१॥
अनुवाद
जब मैं अपने पिता के घर में रहती थी, तब मैंने भगवान दुर्वासा को अपनी सेवाओं से प्रसन्न किया और उन्होंने मुझे वरदान दिया कि मैं किसी भी देवता को मंत्रों द्वारा बुला सकती हूँ। मेरे पिता कुन्तीभोज मेरा बहुत सम्मान करते थे। राजा के अन्तःपुर में रहते हुए मैं भारी मन से ब्राह्मण की मन्त्रशक्ति और वाणीशक्ति का चिन्तन करने लगी।॥19-21॥
When I was living in my father's house, I pleased Lord Durvasa with my services and he gave me the boon that I can call any god to me by invoking him with mantras. My father Kunti Bhoja respected me a lot. Living in the king's inner palace, I started thinking about the power of mantras and the power of speech of a Brahmin with a heavy heart.॥19-21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥