श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 143: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  5.143.52 
तत: शीघ्रतरं प्रायात् केशव: सहसात्यकि:।
पुनरुच्चारयन् वाणीं याहि याहीति सारथिम्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर श्रीकृष्ण सात्यकि के साथ सारथि से बार-बार ‘चलो, चलें’ कहते हुए अत्यन्त तीव्र गति से उपप्लव्य नगर की ओर चलने लगे॥52॥
 
Thereafter, Shri Krishna along with Satyaki started moving towards Upaplavya city at a very fast speed, repeatedly saying 'Come on, let's go' to the charioteer. 52॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे कृष्णकर्णसंवादे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने अभिप्राय निवेदनके प्रसंगमें भगवद्वाक्यविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)