श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 143: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.143.47 
सर्वेषां तात भूतानां विनाशे प्रत्युपस्थिते।
अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! जब सम्पूर्ण प्राणियों का विनाश निकट आ जाता है, तब अन्याय भी न्याय के समान प्रतीत होता है और हृदय से निकल नहीं पाता। ॥47॥
 
O dear! When the destruction of all beings is near, then even injustice seems like justice and cannot leave the heart. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)