श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 143: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  5.143.36 
क्षपयिष्यति न: सर्वान् स सुव्यक्तं महारणे।
विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जय:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
अतः यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे इस महायुद्ध में हम सबका नाश कर देंगे। हे हृषिकेश! मैं यह भी जानता हूँ कि जहाँ धर्म होता है, वहीं विजय होती है।
 
Therefore it seems clear that they will destroy all of us in this great war. O Hrishikesh! I also know that where there is Dharma, that side wins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)