श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 143: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.143.33 
अस्थिसंचयमारूढश्चामितौजा युधिष्ठिर:।
सुवर्णपात्र्यां संहृष्टो भुक्तवान् घृतपायसम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मैंने स्वप्न में देखा कि अत्यंत तेजस्वी युधिष्ठिर श्वेत हड्डियों के ढेर पर बैठे हुए हैं और स्वर्णपात्र में रखी हुई घी मिश्रित खीर को बड़े आनंद से खा रहे हैं।
 
I saw in my dream that the extremely radiant Yudhishthira was sitting on a heap of white bones and was eating with great pleasure the kheer mixed with ghee kept in a golden vessel.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)