श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 143: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.143.30 
सहस्रपादं प्रासादं स्वप्नान्ते स्म युधिष्ठिर:।
अधिरोहन् मया दृष्ट: सह भ्रातृभिरच्युत॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अच्युत! स्वप्न के अन्तिम भाग में मैंने युधिष्ठिर को अपने भाइयों के साथ एक सहस्त्र स्तम्भों वाले महल पर चढ़ते देखा।
 
Achyuta! In the last part of the dream, I saw Yudhishthira climbing a palace with a thousand pillars along with his brothers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)