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mahabharat 5.141.8: यहाँ तक कि अधिरथ सूत भी मुझे अपना पुत्र मानते हैं और मैंने भी स्नेहवश उन्हें सदैव अपना पिता माना है ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 5.141: कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 141: कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.141.8 
तथा मामभिजानाति सूतश्चाधिरथ: सुतम्।
पितरं चाभिजानामि तमहं सौहृदात् सदा॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यहाँ तक कि अधिरथ सूत भी मुझे अपना पुत्र मानते हैं और मैंने भी स्नेहवश उन्हें सदैव अपना पिता माना है ॥8॥
 
Even Adhiratha Suta considers me as his son and out of cordiality, I too have always considered him as my father. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)