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श्लोक  5.141.54 
तदत्र पुण्डरीकाक्ष निधत्स्व यदभीप्सितम्।
यथा कात्‍स्‍न्‍‍‍र्ये न वार्ष्णेय क्षत्रं स्वर्गमवाप्नुयात्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे कमलनयन वृष्णिनन्दन! इसकी सिद्धि के लिए आप भी ऐसा ही अभीष्ट प्रयत्न करें जिससे यह समस्त क्षत्रिय समुदाय स्वर्ग को प्राप्त हो।
 
Kamalnayan Vrishninandan! For its accomplishment you too should make such a desirable effort so that this entire group of Kshatriyas reaches heaven. 54.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)