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श्लोक  5.141.45 
यदब्रुवमहं कृष्ण कटुकानि स्म पाण्डवान्।
प्रियार्थं धार्तराष्ट्रस्य तेन तप्ये ह्यकर्मणा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! आज मुझे उन कठोर वचनों का बड़ा पश्चाताप हो रहा है जो मैंने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए पाण्डवों से कहे थे॥ 45॥
 
Shri Krishna! Today I feel very remorseful for the harsh words I spoke to the Pandavas to please Dhritarashtra's son Duryodhan. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)