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mahabharat 5.141.17: जनार्दन! इस समय मैं धृतराष्ट्रपुत्र बुद्धिमान दुर्योधन को मारकर, बन्दी बनाकर, डराकर या लोभ देकर भी उसका अहित नहीं करना चाहता।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 5.141: कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 141: कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.141.17 
वधाद् बन्धाद् भयाद् वापि लोभाद् वापि जनार्दन।
अनृतं नोत्सहे कर्तुं धार्तराष्ट्रस्य धीमत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जनार्दन! इस समय मैं धृतराष्ट्रपुत्र बुद्धिमान दुर्योधन को मारकर, बन्दी बनाकर, डराकर या लोभ देकर भी उसका अहित नहीं करना चाहता।॥17॥
 
Janardan! At this time I do not want to do wrong to the wise Duryodhana, the son of Dhritarashtra, even by killing, imprisoning, fearing or greed. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)