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mahabharat 5.141.12: गोविन्द! अब मैं सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य पाकर, या सोने के ढेर पाकर, या प्रसन्नता या भय से भी इन सब सम्बन्धों को मिथ्या नहीं करना चाहता। ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 5.141: कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.141.12 
न पृथिव्या सकलया न सुवर्णस्य राशिभि:।
हर्षाद् भयाद् वा गोविन्द मिथ्या कर्तुं तदुत्सहे॥ १२॥
 
 
अनुवाद
गोविन्द! अब मैं सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य पाकर, या सोने के ढेर पाकर, या प्रसन्नता या भय से भी इन सब सम्बन्धों को मिथ्या नहीं करना चाहता। ॥12॥
 
Govinda! Now I do not wish to falsify all these relations even after getting the kingdom of the whole earth, or after getting piles of gold or even out of happiness or fear. ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)