श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 14: उपश्रुति देवीकी सहायतासे इन्द्राणीकी इन्द्रसे भेंट  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.14.8 
तत्रापश्यत् सरो दिव्यं नानाशकुनिभिर्वृतम्।
शतयोजनविस्तीर्णं तावदेवायतं शुभम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ एक दिव्य सरोवर दिखाई दिया, जिसमें अनेक प्रकार के जलपक्षी निवास करते थे। वह सुन्दर सरोवर सौ योजन लम्बा और उतना ही चौड़ा था॥8॥
 
There a divine lake was seen, in which many kinds of water birds lived. That beautiful lake was a hundred yojanas long and equally wide.॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)