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mahabharat 5.139.12: जैसे कोई व्यक्ति त्यागे हुए वस्त्र को पहन लेता है और उसे अपना समझता है, वैसे ही तुम भी युधिष्ठिर का राज-धन पाकर लोभ के कारण त्यागी हुई माला के समान उसे अपना समझते हो।   |   mahabharat अध्याय 5.139: भीष्मसे वार्तालाप आरम्भ करके द्रोणाचार्यका दुर्योधनको पुन: संधिके लिये समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.139.12 
वास एव यथा त्यक्तं प्रावृण्वानोऽभिमन्यसे।
स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद् यौधिष्ठिरीं श्रियम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जैसे कोई व्यक्ति त्यागे हुए वस्त्र को पहन लेता है और उसे अपना समझता है, वैसे ही तुम भी युधिष्ठिर का राज-धन पाकर लोभ के कारण त्यागी हुई माला के समान उसे अपना समझते हो।
 
Just as a person wears a discarded garment and considers it his own, similarly, after getting Yudhishthira's royal wealth, you, like a discarded garland, consider her yours out of greed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)