श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 136: विदुलाके उपदेशसे उसके पुत्रका युद्धके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.136.15 
अतृप्यन्नमृतस्येव कृच्छ्राल्लब्धस्य बान्धवात्।
उद्यच्छाम्येष शत्रूणां नियमाय जयाय च॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे ये अमृत के समान वचन बड़ी कठिनाई से सुने गए। इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हुई। देखो, अब मैं अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मिलकर शत्रुओं का दमन करने और विजय प्राप्त करने का कार्य कर रहा हूँ।॥15॥
 
These words of yours which are like nectar were heard with great difficulty. I was not satisfied after hearing them. Look, now I am working with my friends and relatives to suppress the enemies and achieve victory. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)