श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 135: विदुला और उसके पुत्रका संवाद—विदुलाके द्वारा कार्यमें सफलता प्राप्त करने तथा शत्रुवशीकरणके उपायोंका निर्देश  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  5.135.27-28h 
अथ ये नैव कुर्वन्ति नैव जातु भवन्ति ते।
ऐकगुण्यमनीहायामभाव: कर्मणां फलम्॥ २७॥
अथ द्वैगुण्यमीहायां फलं भवति वा न वा।
 
 
अनुवाद
परन्तु जो लोग कार्य आरम्भ ही नहीं करते, वे कभी भी अभीष्ट की प्राप्ति में सफल नहीं होते, अतः कर्म छोड़कर निष्क्रिय बैठे रहने का यही परिणाम है कि लोग कभी भी अभीष्ट की प्राप्ति नहीं कर पाते। परन्तु यदि कोई उत्साहपूर्वक कर्मों में लगा रहे, तो दोनों प्रकार के परिणामों की संभावना रहती है - कर्मों का इच्छित फल प्राप्त हो भी सकता है और नहीं भी। 27 1/2॥
 
But those who do not even start the work, are never successful in achieving their desired, hence the only result of leaving the work and sitting idle is that people can never achieve their desired desire. But if one remains enthusiastically engaged in actions, there is a possibility of both types of results – the desired results of the actions may or may not be achieved. 27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)