श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 135: विदुला और उसके पुत्रका संवाद—विदुलाके द्वारा कार्यमें सफलता प्राप्त करने तथा शत्रुवशीकरणके उपायोंका निर्देश  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  5.135.22-23 
पुत्र उवाच
अकोशस्यासहायस्य कुत: सिद्धिर्जयो मम।
इत्यवस्थां विदित्वैतामात्मनाऽऽत्मनि दारुणाम्॥ २२॥
राज्याद् भावो निवृत्तो मे त्रिदिवादिव दुष्कृते:।
ईदृशं भवती कंचिदुपायमनुपश्यति॥ २३॥
 
 
अनुवाद
पुत्र ने कहा, "माता! मेरे पास न तो धन है, न ही सहायता करने वाले सैनिक, फिर मैं विजय रूपी अभीष्ट सिद्धि कैसे प्राप्त करुँगा? अपनी दयनीय स्थिति पर विचार करके मैंने राज्य से उसी प्रकार मोह मोड़ लिया है, जैसे पापी स्वर्ग से विमुख हो जाता है। क्या आप कोई ऐसा उपाय सोच रही हैं, जिससे मैं विजय प्राप्त कर सकूँ?"
 
The son said, "Mother! I have neither treasure nor soldiers to help me, then how will I achieve the desired success in the form of victory? Thinking about my pitiable condition, I have turned my attachment away from the kingdom in the same way as a sinner turns away from heaven. Are you thinking of any such solution by which I can achieve victory?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)