युद्धाय क्षत्रिय: सृष्ट: संजयेह जयाय च॥ १३॥
जयन् वा वध्यमानो वा प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम्।
न शक्रभवने पुण्ये दिवि तद् विद्यते सुखम्।
यदमित्रान् वशे कृत्वा क्षत्रिय: सुखमश्नुते॥ १४॥
अनुवाद
संजय! विधाता ने इस लोक में क्षत्रियों को युद्ध और विजय के लिए ही उत्पन्न किया है। चाहे वह युद्ध में विजयी हो या मारा जाए, वह इन्द्रलोक को प्राप्त करता है। पुण्यमय स्वर्ग के इन्द्रभवन में भी वह सुख नहीं मिलता जो शत्रुओं को जीतकर वीर क्षत्रिय को मिलता है। 13-14॥
Sanjay! The Creator has created Kshatriyas only for war and victory in this world. Whether he wins or is killed in battle, in all cases he attains Indraloka. Even in Indra Bhavan of the virtuous heaven, one does not get the happiness that a brave Kshatriya experiences after subduing his enemies. 13-14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥