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नियच्छन्नितरान् वर्णान् विनिघ्नन् सर्वदुष्कृत:।
ससहायोऽसहायो वा यावज्जीवं तथा भवेत्॥ ४१॥
अनुवाद
क्षत्रिय चाहे असहाय हो या न हो, वह अन्य जातियों के लोगों को वश में रखता है और सभी पापियों को दण्ड देता है तथा जीवन भर उद्यमी बना रहता है ॥41॥
Whether a Kshatriya is helpless or not, he keeps people of other castes under control and punishes all the sinners and remains as enterprising throughout his life. ॥ 41॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि विदुलापुत्रानुशासने चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें विदुलाका अपने पुत्रको उपदेशविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥