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mahabharat 5.134.40: संजय! श्रेष्ठ बुद्धि वाले क्षत्रिय को उन्मत्त हाथी के समान निर्भय होकर विचरण करना चाहिए तथा सदैव ब्राह्मणों और धर्म को नमस्कार करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 5.134: विदुलाका अपने पुत्रको युद्धके लिये उत्साहित करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 134: विदुलाका अपने पुत्रको युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.134.40 
मातङ्गो मत्त इव च परीयात् सुमहामना:।
ब्राह्मणेभ्यो नमेन्नित्यं धर्मायैव च संजय॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
संजय! श्रेष्ठ बुद्धि वाले क्षत्रिय को उन्मत्त हाथी के समान निर्भय होकर विचरण करना चाहिए तथा सदैव ब्राह्मणों और धर्म को नमस्कार करना चाहिए।
 
Sanjay! A great-minded Kshatriya should roam around fearlessly like a mad elephant and should always salute the Brahmins and the Dharma. 40.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)