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mahabharat 5.133.45: जो मनुष्य उत्तम जीवन जीने के लिए अपने शारीरिक बल पर निर्भर रहता है, वह इस लोक में महान यश और परलोक में सुखमय गति प्राप्त करता है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 5.133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.133.45 
स्वबाहुबलमाश्रित्य योऽभ्युज्जीवति मानव:।
स लोके लभते कीर्तिं परत्र च शुभां गतिम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य उत्तम जीवन जीने के लिए अपने शारीरिक बल पर निर्भर रहता है, वह इस लोक में महान यश और परलोक में सुखमय गति प्राप्त करता है ॥ 45॥
 
A man who relies on his physical strength to lead an excellent life achieves great fame in this world and a happy destination in the next. ॥ 45॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि विदुलापुत्रानुशासने त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें विदुलाका अपने पुत्रको उपदेशविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)