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mahabharat 5.133.23-24h: जिस मनुष्य की दान, तप, सत्यभाषण, विद्या और धनोपार्जन में सफलता सर्वत्र स्वीकार नहीं की जाती, वह अपनी माता का पुत्र नहीं, केवल मूत्र और गोबर के समान है । 23 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 5.133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  5.133.23-24h 
दाने तपसि सत्ये च यस्य नोच्चरितं यश:॥ २३॥
विद्यायामर्थलाभे वा मातुरुच्चार एव स:।
 
 
अनुवाद
जिस मनुष्य की दान, तप, सत्यभाषण, विद्या और धनोपार्जन में सफलता सर्वत्र स्वीकार नहीं की जाती, वह अपनी माता का पुत्र नहीं, केवल मूत्र और गोबर के समान है । 23 1/2॥
 
The man whose success in charity, penance, speaking the truth, learning and earning money is not universally acknowledged is not his mother's son, he is just urine and dung. 23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)