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mahabharat 5.133.16: वीर पुरुष युद्ध में जाकर अपनी पूरी क्षमता से उत्तम पुरुषार्थ करके अपने धर्म का ऋणी हो जाता है और अपनी निन्दा नहीं होने देता ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 5.133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 133: कुन्तीके द्वारा विदुलोपाख्यानका आरम्भ, विदुलाका रणभूमिसे भागकर आये हुए अपने पुत्रको कड़ी फटकार देकर पुन: युद्धके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.133.16 
कृत्वा मानुष्यकं कर्म सृत्वाजिं यावदुत्तमम्।
धर्मस्यानृण्यमाप्नोति न चात्मानं विगर्हते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वीर पुरुष युद्ध में जाकर अपनी पूरी क्षमता से उत्तम पुरुषार्थ करके अपने धर्म का ऋणी हो जाता है और अपनी निन्दा नहीं होने देता ॥16॥
 
A brave man, by going to war and displaying the best efforts to the best of his ability, becomes indebted to his religion and does not allow himself to be criticized. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)